गुरुवार, 19 अगस्त 2010

मिस यू मूंबई...

इस तस्वीर को सिर्फ एक झलक देखिए,हो सकता है कि आप इस रेलवे स्टेशन का नाम न बता सकें,लेकिन इतना तो ज़रुर बता देंगें कि यह लोकल ट्रेन खड़ी है, और यह नज़ारा मुंबई के किसी स्टेशन का हो सकता है...।
अब ज़रा गौर से इस नीचे वाली तस्वीर को देखिए क्या आप बता सकते हैं कि यह तस्वीर कहां कि है?
चलिए मैं बताता हूं
सबसे उपर जो तस्वीर है वो मुंबई के सीएसटी रेलवे स्टेशन पर खड़ी लोकल ट्रेन ही है,और नीचे की ये तस्वीर दिल्ली की हाईटेक मेट्रो ट्रेन है जो राजीव चौक स्टेशन पर अपने गुजरने के इंतज़ार में खड़ी हैं।
..मेट्रों में सफर करने वाले कुछ इस तरह सफर करते हैं..
जबकि मुंबई में लोकल में सफर करने वाले मुसाफिर कुछ यूं पहुंचते हैं अपनी मंजिल तक।

एक साल पहले मुंबई की भागती दौड़ती ज़िंदगी का हिस्सा मैं भी था रोज बोरिवली से सीएसटी तक फास्ट ट्रेन पकड़ता था लेकिन जिस दिन मैं विरार वाली ट्रेन पकड़ लेता था और सीएसटी तक जाता था उस दिन ज़िंदगी का एक नया मज़ा मिलता था,विरार टू सिएसटी की जगह इस ट्रेन का नाम कयामत से कयामत तक होना चहिए,एक साल तक रोज आते जाते न जाने कितने अंजान चेहरे दोस्त बन गए थे सुमित भाई,श्रीकांत,अजित सर और बहुत सारे...।
लेकिन अब मुंबई नहीं रहा या यूं कहें कि अब मैं मुंबई में नहीं रहा...अब मैं रसूखदारों के शहर,दिलवालों के शहर,दिल्ली में हूं...और लोकल की जगह हाईटेक मेट्रों ने ले ली है,राजीव चौक से पटेल चौक तक रोज के सफर में अब कुछ लोग मिलने लगे हैं जो रोज ही मिल जाते हैं,कुछ देखकर मुस्कुराने भी लगे हैं लोकल की तरह राहगीरों का अभी गुट नहीं बना, न ही सीट निर्धारित हुई है कि कौन कहां बैठेगा...आज आफिस के लिए निकला बाहर बारिश हो रही थी मेट्रों में गजब की भीड़ थी,अंदर घुसते ही लगा लोकल में आ ही गया हूं मेट्रों की छत से जगह जगह पानी टपक रहा था...हर दूसरा आदमी पहले आदमी की गर्म सांसे साफ तौर पर महसूस कर रहा था...बार बार मुंबई याद आ रहा था हर बार हर स्टेशन पर ऐसा लग रहा था मानों सीएसटी आने वाला है ।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

जियो हाजी भाई...।

फिल्मकारों को गैंगस्टर, अंडरवर्ल्ड, माफिया, डॉन और तस्कर हमेशा से भाते रहे हैं। ऐसा स्वाभाविक भी है। 50 के दशक में, एक दिन सपनों में जीने वाली बम्बई दहल गई थी। वजह थी दिन-दहाड़े एक बैंक में हुई डकैती। मुम्बई की यह पहली बैंक डकैती फोर्ट इलाके के द लॉयड बैंक में हुई थी। इसी दौरान दिल्ली से बम्बई गए अनोखे लाल नामक व्यक्ति ने 16 लाख की यह डकैती डाली थी। अनोखे लाल को इस डकैती का आइडिया बैंक डकैती पर बनी अमेरिकी फिल्म ‘हाईवे 301’ से मिला था। डकैती के बाद से फिल्म ‘हाईवे 301’ को बम्बई में बैन कर दिया गया था। गैंगस्टर से बम्बई और बॉलीवुड का यह पहला परिचय था …….
“सुल्तान मिर्जा़”…. जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह,जिसे खाकीधारियों की नज़र में स्मगलर कहा जाता है और गरीबों की ज़ुबान में मसीहा...। वो एक को लूटता है और फिर दस में बांट देता है...सब कुछ फिल्मी....बिल्कुल फिल्मी..
जी हां मैं वही बात कर रहा हूं जो आप समझ रहें हैं फिल्म वंस अपान द टाइम इन मुंबई की,फिल्म की रिलीज होने के पहले बहुत सारे कयास सामने आए किसी ने कहा कि मुंबई के पहले डॉन हाजी मस्तान की निजी जिंदगी में दखलांदाजी कर रही है मिलन लुथारिया की यह फिल्म, तो वहीं हाजी मस्तान के घर वालों को यह आशंका सता रही थी कि पता नहीं फिल्म में क्या क्या दिखाया होगा..।
आखिरकार फिल्म रिलीज हुई,..मद्रास में भीषण बाढ़ आई और एक परिवार पानी की लहरों पर शांत हो गया,परिवार का एक बच्चा बच गया जो पता नहीं कैसे जादू की नगरी यानि मुंबई पहुंच गया...बावा भी कुछ ऐसे ही मुंबई पहुंचा था,लेकिन लहरों से बचकर नहीं अपने पिता हैदर मिर्जा़ के साथ.. बावा यानि हाजी मस्तान,हाजी मस्तान का बचपन का नाम बावा था... हैदर मिर्जा ने मुंबई पहुंचकर साईकिल और टु व्हीलर रिपेयरिग की एक दुकान खोली..अपने पिता के साथ बावा भी दुकान में हाथ बंटाता था..लेकिन दुकान पर उसका मन नहीं लगा,किस्मत ने साथ दिया और उसे एक नौकरी मिल गई,कुली की नौकरी,बावा बंदरगाह में कुली बन गया और अदेव और हांग कांग से आने वाले मुसाफिरों का सामान उठाने लगा..बंदरगाह और मुसाफिरों से याराना कुछ इस कदर बढ़ा कि समंदर की लहरों ने सीढि़यां बनायीं और और उस पर चढकर बावा जुर्म की उस मीनार पर जा बैठा जहां सिर्फ एक ही सरताज था खुद बावा...। बावा 1 मार्च 1926 को तमिलनाडु के पनैकुलम में पैदा हुए था बावा के बारें में किसी ने सोचा भी नही होगा कि एक अदद जूते पहनने को तरसने वाला यह शख्श पूरे मुंबई को अपने पैर की जूती बना लेगा...।
खैर...मैने अभी अभी वंस अपान द टाइम इन मुंबई देखी है, मुझे फिल्म बहुत अच्छी लगी उसके बाद मैने हाजी मस्तान की जीवनी अपने गूगल गुरु से निकाली और चाट ली...मुझे फिल्म भी अच्छी लगी और हाजी भाई की जीवनी भी...एकदम लल्लनटॉप। दिल्ली में अपने यूएनआई आफिस में बैठा हूं..बाहर जोरदार बारिश हो रही है कहीं शूट पर नहीं निकलना था और मेरे पास कोई काम भी नहीं था तो सोचा क्यों न कुछ बतकही ही हो जाए...।
वैसे फिल्म अच्छी है साथ ही मेरे दिमाग में अभी भी ये सवाल भी है कि क्या वास्तव में हाजी मस्तान ऐसा ही था...?

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

खुजलीबाज और उंगलीबाज


खुजलीबाज और उंगलीबाज
कई दिनों से कुछ लिखने की फिराक में हूं,लेकिन मेरी लिखने की अभिलाषाओं पर दो तरह के लोग मिलकर ऐसा तुषारापात करते हैं कि भावनाओं की फसल का अंकुर कागज़ पर उतरने के पहले ही मटियामेट हो जाता है...ये दोनो सुकून और शांति के दुश्मन हैं... दोनों की नज़र हमेशा ऐसे महानुभावों पर रहती है जो जिंदगी की भागमभाग से अलग होकर कुछ पल चैन से रहना चाहते हैं...इनमें से एक का नाम है खुजलीबाज...। खुजलीबाज एक ऐसा प्राणी है जो हर दफ्तर कार्यालय में पाया जाता है..इतना ही नहीं, राह चलते सड़क पर, स्टेशन पर , या फिर पिक्चर हॉल में भी ऐसे प्राणियों की प्रजाति बड़ी आसानी से मिल जाती है...। खुजलीबाज जब कभी भी फ्री होता है, न जाने क्यों प्राकृतिक रुप से उसकी तशरीफ में खुजली होने लगती है...खुजली भी ऐसी जिसका कोई जोड़ नहीं, कोई तोड़ नहीं..इनकी खुजलाहट के आगे बीटेक्स, और इचगार्ड जैसी दवाइयों को भी पसीना आ जाता है...इस खुजलाहट को वो अपने परम मित्र, बड़े विचित्र माननीय उंगलीबाज से शेयर करता है, उंगलीबाज की पहचान उसकी उंगली है,उसकी उंगली में सलमान के “दस के दम” से कहीं ज़्यादा दम होता है...इन दोनो ने मिलकर इतना चरस किया है कि मेरे साथ साथ पूरा देश त्राहिमाम कर रहा है...इन दोनों के सामने कोई इंसान अपने मन मुताबिक काम नहीं कर सकता...उसके खुद के काम में अड़ंगा लगाकर ये ऐसा कार्यभार दिलाते हैं मानों देश की धरती से सारा सोना एक ही दिन में निकलवा लेंगे..।
सिर्फ देश ही नहीं विदेश की राजनीति में भी इन दोनो का अच्छा खासा दखल है...और इन दोनों ने अपने अपने गुरु भी बना रखे हैं..जितने भी खुजलीबाज हैं उनके गुरु आदरणीय शशी थरुर जी हैं,जिनकी खुजली ने देश के सारे राजनीतिज्ञों की खाज में चार चांद लगा रखा है...वहीं उंगलीबाजों को मैदान में डटे रहने की हिदायत उंगलीमास्टर अमरसिंह से मिलती है...दुनिया के समस्त उंगलीबाज इन्हें पिता तुल्य मानते हैं...अपनी उंगली की ताकत ये समय समय पर दिखाते रहते हैं...।
खैर...कई दिनों की मशक्कत के बाद आखिरकार मैं कुछ लिखने में सफल हो गया,हालांकि आज भी ये खुजलीबाज और उंगलीबाज राह में रोड़े अटका रहे थे लेकिन इन दोनों के प्रकोप से अंतत: मैं बच गया....।
भले ही मैं बच गया लेकिन आप लोगों को हिदायत दे रहा हूं ज़रा बच के रहना इन दोंनों से...।

सोमवार, 8 मार्च 2010

अगले जनम मोहे बेटा न कीजो

पूरा देश अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है।मैंने भी सोच रखा था कि कुछ तो ज़रुर लिखुंगा मैं भी..कल शाम से ही दिमाग में दुनिया भर का फितूर हिलोरें मार रहा था..सुबह सुबह आफिस पहुंचा जैसे ही कम्प्यूटर सिस्टम आन किया आलोक सिंह भदौरिया जी की पोस्ट पर नज़र पड़ी इसे पढ़ने के बाद मुझे लगा कि आलोक जी ने मेरे लिखने के लिए कुछ नहीं छोड़ा..इस लेख को पढ़ने के बाद आपसे सिर्फ इतना कहूंगा कि.. अगले जनम मोहे बेटा न कीजो....
इस पोस्ट पर एक नज़र ज़रुर डालें।
अगले जनम मोहे बेटा न कीजो
आलोक सिंह भदौरिया
‘अवतार पयंबर जनती है, फिर भी शैतान की बेटी है...’ औरत की हालत पर साहिर लुधियानवी ने कभी लिखा था। ये लाइनें मैं बचपन से सुनता आया हूं और यह सवाल भी खुद से पूछता रहा हूं। पिछले तीन महीनों से एक अजीब-सी आग में जल रहा है दिल-दिमाग। उस आग की आंच में बाकी सारे विचार खाक हो गए, एक अक्षर भी नहीं लिख सका।

इसकी शुरुआत तीन महीने पहले हुई जब ऑफिस में अपनी सीनियर और साथ काम करने वाली दोस्त से एक जुमला सुना - लड़के/मर्द कमीने होते हैं। इतनी साफ गाली मैंने कभी नहीं सुनी थी। सो जोर देकर पूछा, मैडम, आपको क्या लगता है, क्या मैं भी, हमारे पिता-भाई सभी मर्द कमीने हैं? उन्होंने मेरा दिल बहलाने को भी पलकें नहीं झपकाईं। याद आया, जब बहनों की समस्याएं समझने, उन्हें सीख देने की कोशिश करता था तो अक्सर सुनना पड़ता था, आप नहीं समझोगे भइया, आप लड़के हो। यहां भी वही डायलॉग- तुम नहीं समझोगे...।

क्यों नहीं समझूंगा मैं, दूसरे ग्रह से आया हूं? इसी समाज में पला-बढ़ा हूं। बहरहाल, बहस करने की जगह मैंने ठान लिया, आज से खुद को महिला या लड़की समझकर अपने माहौल को आंकने की कोशिश करूंगा। इन तीन महीनों में ही मैं यह कहने को मजबूर हो गया- मर्द वाकई कमीने होते हैं, कुत्ते नहीं बल्कि भेड़िए। हां, इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन अपनी मां, बहनों, बेटियों और दोस्तों की सलामती के लिए यही कहूंगा कि जब तक हालात नहीं बदलते, मुझ पर भी भरोसा मत करना।

इन तीन महीनों में देखा, हम मर्दों की दुनिया औरत के शरीर के इर्द-गिर्द घूमती है। हमारे चुटकुले, हमारी कुंठाएं, गॉसिप, हमारे बाजार यहां तक कि हमारी खबरें भी। हम इस हद तक निर्मम और संवेदनाहीन हो चुके हैं कि जिस शरीर से जन्म लिया, जब वही शरीर जीवन के अंकुरण की प्रक्रिया से हर महीने गुजरता है तो उस दर्द का भी मजाक उड़ाने में नहीं हिचकते। मर्दों के लिए कमीने से भी गई-गुजरी गाली ढूंढनी पड़ेगी। किसी उम्र, पद, तबका, रंग, नस्ल, हैसियत का मर्द हो, इसका अपवाद नहीं। इन तीन महीनों में मुझे लगा कि मैं नरभक्षी राक्षसों के बीच जी रहा हूं, अगर इनके बीच सारी उम्र काटनी पड़ती तो...? कांप उठता हूं। हां, हम दोगले भी हैं, जैसे ही कोई लड़की अगल-बगल दिखती थी, हममें से कुछ तो शालीनता की चादर ओढ़ लेते, कुछ को तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता था।

इस दौरान मैंने हमें जनम देने वाली ‘शैतान की बेटी’ को और करीब से जानने की कोशिश की। दिल्ली एक बेरहम महानगर है, लेकिन सुबह 4:30 से रात 2:30 बजे तक मैंने इन्हें बेखौफ अंदाज में, खिलखिलाते, अपनी तन्मयता में अपनी-अपनी राह जाते देखा। इनमें से कई छोटे शहरों से या गांवों से आईं थीं, अधिकतर अकेली। कुछ परिवारों के साथ रहते हुए भी निपट अकेली थीं। लेकिन एक बात सभी में समान थी, सब अपने-अपने कंधों पर एक बोझ उठाए थीं, मां-बाप से यह कहतीं - हम अपने भाइयों से कहीं भी कम नहीं, तुमने एक लड़के की चाह में हमें नामुराद की तरह इस दुनिया में ढकेल दिया। हमारे पैदा होने पर खुशी तो दूर, नवजात शरीर को ढंकने के लिए साफ, नए कपड़े तक नहीं मिल सके। तब शायद हम यही सोचकर जिंदा रहे कि एक दिन तुम्हें बता सकें कि हम तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाले लड़के से किसी सूरत में पीछे नहीं हैं। लेकिन वह यह कह रही थीं बिना किसी विज्ञापन के, किसी मौन योद्धा की तरह।

मैंने देखा हर बार मर्दों की खड़ी दीवार ने इनके कद को और बढ़ा दिया है। एक और अजीब बात, मैंने हर लड़की को जिंदगी का एक-एक पल बिंदास होकर जीते देखा, वजह ... उन्हें पता नहीं कि अगले पल उनकी जिंदगी का क्या होगा। इसी सबके दौरान वे अपने सपने, शौक और जुनून को जिंदा रखे हुए थीं। कमरतोड़ 10 घंटों की नौकरी के बाद अगले 10 घंटे एक पैर पर खड़े-खड़े बिता देतीं, महज इसलिए कि... वह उन्हें रूटीन से आजादी देता है, पल भर के लिए हवा के ताजा झोंके की तरह। इस सबके मूल में यह था, कल को पता नहीं किसके पल्ले बंधना पड़े, न जाने कौन पर कतर दे। अब जा कर पता लगा कि मर्दों की जिंदगी तो 60, 70, 80 बरस की होती है, लेकिन इन लड़कियों की जिंदगी बस 25-26 तक। यानी तब तक जब तक गृहस्थी की उम्रकैद नहीं शुरू हो जाती। चौंक गए, हमारी-आपकी मांएं इसी गृहस्थी की चारदीवारी में बंद कैदी हैं। वे भूल गई हैं, इसके बाहर भी दुनिया बसती है। उन्हें जरा इस लोहे के फाटक से बाहर खड़ा करके तो देखिए, अबोध बच्चे की तरह लडख़ड़ा कर बैठ जाएंगी, मुमकिन है खुद लौटकर इसी जेल का दरवाजा खटखटाकर अंदर आने की गुहार लगाएं।

इस अंतराल में एक और ख्याल आया कि यह पूरी दुनिया मर्दपरस्त है, हमारी साइंस, मेडिकल जगत भी। एक दिन बस से जा रहा था, अचानक किसी खिड़की के पास से आवाज आई, इन्हें हमारी चिंता होती तो जैसे कॉन्डम वेंडिंग मशीन लगाई, वैसे ही सेनेटरी नैपकिन की वेंडिंग मशीन न लगा देते। मैं सन्न रह गया, सूरज की रोशनी में चमकता हुआ एक माथा, कच्चे दूध सी पवित्रता लिए भोली-सी आंखें यह सवाल पूछ रही थीं। सच है, यह ख्याल हम मर्दों को क्यों नहीं आया? शायद हर महीने मर्दों को यह तकलीफ झेलनी होती तो शायद साइंटिस्टों की पूरी जमात चांद पर पानी बाद में खोजती, सबसे पहले इस दर्द को कम करने में जुट जाती। चूंकि मर्द को दर्द नहीं होता, इसलिए औरत का शरीर नरक का द्वार है कह कर छुटकारा पा लेता है।

उफ्फ, कैसे इतनी दीवारें खींच लीं हमने। मर्द-औरत अलग-अलग ग्रहों से नहीं आए हैं। फिर यह अविश्वास क्यों? मुझे तो लगता है, मर्द डरे हुए हैं औरतों से, मौन रहकर दर्द सहने की उसकी क्षमता से, अपने जीवन की बाजी लगाकर एक नई जिंदगी को इस दुनिया में लाने की ताकत से। इंद्र का भी सिंहासन कांप उठा होगा कि कहीं कोई औरत न उस पर काबिज हो जाए। तबसे ही पैदा होते ही लड़की को एक झूठे प्रचार का सामना करना पड़ता है, प्रोपैगंडा का सामना करना पड़ता है, उसे समझाया जाता है कि वह कितनी अबला और असुरक्षित है। खैर...

पर मेरा तर्क फिर सिर उठाता है - दोस्त, सभी मर्द, लड़के एक जैसे नहीं होते। देखो, मैं बिल्कुल वैसा नहीं हूं, क्योंकि मुझे तुमने ही गढ़ा है। मेरी मां, मेरी तीनों बहनों ने मुझे ऐसा बनाया है कि मैं इस दर्द को महसूस कर सकता हूं, फिर मुझे दोषियों की कतार में क्यों खड़ा कर देती हो? और... मेरे पापा भी वैसे नहीं हैं, अपने कुनबे में अफीम चटाकर मौत की नींद सुला दी जातीं लड़कियों को जिंदगी देने के लिए उन्होंने लड़कपन में ही जीतोड़ कोशिश की और कामयाबी भी पाई। मेरी एक बुआ को तो वह गांव के बाहर कचरे के ढेर से उठाकर लाए थे।

लेकिन लगता है कि हमारी जमात के अपराध इतने ज्यादा हैं कि विधाता से इतना ही कहना चाहता हूं, अगले जनम मोहे बिटुआ न कीजो, मुझे भी शैतान की बेटी ही बनाना ताकि मैं भी इस मौन संघर्ष का हिस्सा बन सकूं।
जाते-जाते एक बात और... साहिर लुधियानवी की मशहूर नज्म "औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया" को लता मंगेशकर ने साधना फिल्म के लिए गाया था। इस गाने को यूट्यूब पर सुनने के लिए यहां क्लिक करें। औरतों पर इतना बेहतरीन गीत एक महिला की आवाज़ में सुनकर शायद आपकी आंखों में भी आंसू आ जाएं। और यह सोचकर अच्छा लगता है कि यह गीत एक मर्द - साहिर लुधियानवी - ने लिखा था।

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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अब न रही वह होली, अब न रहे होलिहार!

अब न रही वह होली, अब न रहे होलिहार!


बड़ी गहरी नींद में सो रहा था!इस बात से बेखबर कि कल होली है!सुबह सुबह ही फोन की घनघनाहट ने नींद में खलल डाली!उनींदे स्वर में फोन रिसीव किया!गांव से छोटे भाई का फोन था!फोन रिसीव होते ही उसने पूछा,भाई घर नहीं आ रहें हैं क्या? मैंने छुट्टी न मिलने का रोना रोया,थोड़ा मायूस होकर उसने फोन रख दिया! जितना मायूस छोटा भाई हुआ था उससे कहीं ज्यादा मायूस मैं था क्यों कि मैं उसकी भावनाओं को समझ रहा था! थोड़ी देर में मैं फ्लैश बैक में चला गया!जब मैं गांव में रहता था,होली के दस दिन पहले से ही चच्चू के घर आने का इंतज़ार करने लगता था! जिस साल होली पर चच्चू नहीं आते थे,उस वर्ष होली के रंग फीके रहते थे, लेकिन जिस साल चच्चू आ जाते थे उस साल होली का मज़ा कई गुना बढ़ जाता था!

होली के चटक रंग, भंग की तरंग एवं बच्चों की हुड़दंग के साथ हमारी टोली ऐसा समा बांधती थी कि बूढ़ी हो चुकी धड़कनों में भी युवा अरमान मचल उठते थे.. वसंत की आहट आते ही गंवई लोगों के जेहन में होली की हुड़दंग की तस्वीर उभरने लगती थी,चौपालों में ढोल की थाप व मजीरों की झनझनाहट के बीच होली खेलयं रघुवीरा अवध में,और होली है..जैसे गीत गूंजने लगते थे। चौपाल में गूंजते होली गीतों को सुनने के लिए घर की बहुएं, भौजाइयां घूंघट के पट के भीतर मुस्कुराते हुए बाहर ड्योढ़ी तक आती थीं। भौजाइयों को देख जहां युवा मन से गीत की तरंग फूटती, वहीं चौपाल में बैठे बाबा अपने मूंछों को ताव दे फागुनी गीत के सुर को धार देते। चौपाल में किया गया उनका हर मजाक 'फागुन में बाबा देवर लागैं' की तर्ज पर क्षम्य हो जाते थे।फाग की यह संस्कृति भाई-चारे और आपसी मोहब्बत का पैगाम लेकर आती थी और सामाजिक बिखराव को जोड़ने की कड़ी के रूप में उभरती थी। लोग होली के दिन रंग खेलते व अबीर गुलाल लगाकर गले मिलकर सारे गिले शिकवे भूल जाते थे। एक-दूसरे के यहां जाकर लजीज व्यंजन का लुत्फ उठाते थे। भांग व ठंडई का भी दौर चलता था।
लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात रही।शहर की आपाधापी और भागमदौड़ से सनी हवाएं गावों की मदमस्त हवाओं में इस कदर घुल गयी हैं की गांव की होली के नैन नक्श बदल गए हैं...होली की परंपरा विलुप्त होने की कगार पर है। अब होलिहार शहर आ गए हैं..नौकरी करने लगे हैं... अब फागुन का पूरा माह बीत जाता है..लेकिन किसी गांव में न तो ढोलक की थाप सुनायी देती है और न ही मजीरों और झांझ की मधुर झनकार। हम भी बाहर निकलकर होली की हुड़दंग में शामिल होने के बजाय घर में सीडी प्लेयर से होली के मन पसंद फिल्मी व भोजपुरी गीत सुनकर और फिल्म देखकर होली की परंपरा निभा रहे हैं.. तो भइया हमारी तरफ से आपको ब्लॉग के जरिए ही सही,लोकिन शहरी होली की ढेर सारी शुभकामनाएं।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

अलविदा २००९...

नव वर्ष आ गया है नवल चाह को लेकर,
नव गीत रीति नीति नवल राह को लेकर !
सब कुछ नया नया सा लगे नवल वर्ष में,
जीवन की बंदिशों में नव प्रवाह को लेकर !!
उम्मीदों के ताने बाने में उलझा ,अपनी उपस्थिति का एहसास कराने के लिए तैयार है एक और नया वर्ष!
समृद्धि का पर्याय बनकर बिलकुल समीप खड़ा है एक और नया वर्ष! ठीक उसी तरह जैसे कुछ महीने पहले इन्ही सर्दियों में आया था वर्ष २००९,नया बनके,लेकिन वो बीता हुआ कल हो गया है,अब वह नवीन वर्ष नहीं है,बल्कि उस सरहद के अंतिम छोर पर खड़ा है,जंहा से वह कभी वापस नहीं आएगा,आएँगी तो सिर्फ वर्ष २००९ की यादें!
परिवर्तन ने एक बार फिर अपने पंखो को परवाज़ दी और समय की सीढ़ियों से सरक गया एक और साल,बिलकुल वैसे,जैसे बंद मुट्ठी से सरक जाते हैं रेत के कण !सिन्दूरी शाम ने पृथ्वी को अपनी आगोश में ले रखा है,२००९ का अंतिम सूरज भरी मन और थके कदम से धीरे धीरे अस्त होने के लिए जा रहा है!
कल की सुबह २०१० के सूरज के साथ होगी जो अपने साथ नए विश्वास को लेकर निकलेगा!न जाने क्यों आशावादी विचारधाराएँ मस्तिष्क में कौंध रही हैं आशान्वित हैं हम की आने वाला साल उन सभी जख्मो पर मरहम लगाएगा जो २००९ ने हमें दिए हैं!उम्मीदों का पिटारा एक बार फिर खुलेगा और और उस जादुई पिटारे से निकलेगा कोई देवदूत,जो जीवन की परिकल्पना को साकार करेगा और स्नेह के उत्कर्ष में गोते लगा सकेगा मेरे और आपके जैसा इन्सान!कुल मिलाकर नए साल के स्वागत के लिए तैयार हैं हम सब,वैसे भी स्वागत करना हमारी संस्कृति है,हमारी परम्पराओं का हिस्सा है,स्वागत शब्द हमारी रगों में लहू बनकर दौड़ता है! इतिहास गवाह है,हमने हर नए आगंतुक के स्वागत में पलक पावडे बिछाए हैं,उनका सत्कार किया है! ये अलग बात है की कभी कभी इन्ही मेहमानों ने हमारी जिंदगी के कुछ पन्नो में गम की इबादत लिख दी है! जिन्हें याद करने के बाद अनायास ही पलकें भारी हो जाती हैं,या यूँ कहें की कुछ पल परेशानियों के बेताल बनकर हमारी पीठ पर लद गए हैं,और हम विक्रम बनकर वर्ष-दर-वर्ष उन्हें ढोते चले आ रहे हैं! वर्ष २००८ का नवम्बर महीना आज भी हमें डराता है,हमने नहीं सोचा था की जिस २००८ के आने का जश्न हमने जोर शोर से मनाया था ,जिस २००८ की मेहमान नवाजी हमने लोगों को शुभकामनायें देकर की थी ,वही २००८ जाते जाते दे जायेगा एक मनहूस तारीख जो जब जब याद आएगी तब तब मुस्कान को भी आंसू आयेंगे!कुछ खट्टे मीठे अनुभव के साथ आख़िरकार बीत गया २००९ भी! बीते हुए लम्हे को याद करके उसकी परिभाषा को कुछ यूँ पिरोया है मशहूर शायर निदा फाजली ने " जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नयी जाता "
जिस साल की उम्र सिर्फ एक दिन बाकी है वह बीत तो जायेगा लेकिन गुजरेगा नहीं क्यों की उसकी मधुरता और कसक यादों में ही सही पर साँस लेगी.....

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

बाबू की बचकानी बातें.......




बाबू की बचकानी बातें.......
आपने राजू श्रीवास्तव,एहसान कुरैशी,सुनीलपाल का नाम तो सुना ही होगा. ये वो लोग हैं, जो अपनी चुटीली बातों से लोगों का मनोरंजन करते हैं,लेकिन इन हास्य अभिनेताओ के साथ एक नाम और जुड़ गया है,और वो नाम है अपने 'राजू भैया' का. नही समझे,अमा मियाँ राजू का मतलब "मनसे प्रमुख राज ठाकरे"हिन्दी भाषियों के लिए विषपुरूष बन गये राज
आजकल यूपी बिहार वालो के लिए मनोरंजन का साधन बन गये हैं. खुदा कसम जितना हसी राजू श्रीवास्तवा के कार्यक्रम मे नही आती,उससे कही ज़्यादा राज ठाकरे का भाषण सुनकर आती है.वाह,क्या बोलता है....,बस मज़ा आ जाता है,अब कल ही "जनता की अदालत कार्यक्रम" मे अपने राज ने एक चुटकुला सुनाया.चुटकुला ये था की, "भैया लोग पानिपूरी बेचें",सरकार चलाने के चक्कर मे ना पड़े.पानिपूरी नही समझे,अरे भाई...पानिपूरी को दिल्ली वाले बताशा कहते हैं,कही कही इसे गोलगप्पे कहा जाता है,और हमारे जैसे बज्र देहाती,ठेठ इलाहाबादी इसे फुल्की कहते हैं.सिर्फ़ यूपी बिहार ही नही,परप्रांतीय लोगो पर भी झमाझम बरसे अपने राज बाबू.राज ठाकरे की माने तो वो महाराष्ट्र की राजनीति मे परप्रांतीय लोगो को नही आने देंगे,यानी मुंबई की राजनीति परप्रांतीय नही चलाएँगे. लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है मुंबई की राजनीति,परप्रांतीय ही चला रहे हैं. सिर्फ़ राजस्थान के ही १७ विधायक हैं.इसके अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कृपाशंकर सिंह पूर्व गृह मंत्री,नसीम ख़ान गृह मंत्री,इसी तरह कई ऐसे नाम हैं जैसे अबू आज़मी,हरिवंश सिंह,वीरेंद्र उपाध्याय,संजय निरूपम,मुरली देवड़ा,फययाज़ ख़ान,घनश्याम दुबे,गुरुदास कामद,और बहुत से नाम हैं,जिनकी महाराष्ट्र की राजनीति मे सक्रिय सहभागिता है.लेकिन पता नही क्यों,राज ठाकरे ऐसी बचकानी बातें करते हैं? दूसरी बात ये की राज ठाकरे अपने आप को गरम दल का नेता कहते हैं," कान के नीचे बजाने के लिए"हमेशा तैयार रहते हैं.सिर्फ़ कहते ही नही हैं कभी कभी बजाते भी हैं,रिक्शे वालो को,टॅक्सी वालो को,ग़रीब मजदूरो को,दुकानदारो को,वाचमैन को,लेकिन अब यूपी बिहार के लोग भी लतखोरियत की हद पार कर गये हैं,उन्होने राज बाबू को घंटे पे मार दिया है, इनका कहना है की... अब तुम चिल्लाओगे तो हम डरेंगे नही, बल्कि हसेगे,यूपी बिहार के लोगों ने भी मन को संतोष दे दिया की,यह बजने बजाने का दौर जब चुनाव आएगा तभी आएगा ,और कभी अगर हमको भी मौका मिला तो बजने बजाने का खेल हम भी ज़रूर खेलेंगे,और अगर बजाने का भी मौका मिला तो ऐसा बजाएँगे की सामने वाले के कदम थिरकने लगे,बस यूँ समझ लो की वह भरतनाट्यम करने पर मजबूर हो जाएगा.खैर बात हो रही थी मनोरंजन की.तो भाई, मै तो राजू श्रीवास्तवा की जगह राज ठाकरे को सुनना पसंद करूँगा ,अब आप की मर्ज़ी आप चाहे जिसे
सुने,आपकी मर्ज़ी.....